सिक्ख रहत मर्यादा

१ औं सतिगुर प्रसादि ।।

सिक्ख रहत मर्यादा

सिक्ख का लक्षणजो स्त्री या पुरुष, एक अकाल पुरख, दस गुरु साहिबान (श्री गुरु नानक देव जी से श्री गुरु गोबिन्द सिंघ साहिब पर्यन्त) श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी तथा दस गुरु साहिबान की वाणी और शिक्षा और दशमेश जी के अमृत (खण्डे की पाहुल) पर श्रद्धा रखता है तथा किसी अन्य धर्म को नहीं मानता वह सिक्ख है। सिक्ख आचरण के (रहनि) दो प्रकार हैं-व्यक्तिगत तथा पंथक ।

व्यक्तिगत आचरण (रहणी)

१. नाम-बाणी का अभ्यास

२. गुरुमत जीवन

३. सेवा

१ नाम-बाणी का अभ्यास

१. सिक्ख अमृत वेला में जब एक पहर रात शेष रहे जाग कर स्नान करे, तथा एक अकाल पुरख परमात्मा का ध्यान करता हुआ ‘वाहिगुरु’ नाम का जाप करे।

२. नितनेम का पाठ करे। नितनेम की बाणियाँ ये हैं-जपु, जापु तथा १० सवैये (‘स्रावग सुद्ध’ वाले) ये बाणियाँ अमृत वेला में पढ़नी हैं।सोदरु रहरासि-सायंकल सूर्यास्त होने पर पढ़नी हैं। इस में ये बाणियाँ सम्मलित हैं-

श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी में लिखे हुये नौ शब्द ‘सोदरु से लेकर सरणि रच्छा’ से लेकर दुसट दोख ते लेह बचाई’ तक) सवैया (पाए गहे जब ते तुमरे) परे की राखहु सरमा’ तक) बेनती चौपई पातशाही १० (‘हमरी करो हाथ दै तथा दोहरा (सगल दुआर कउ छाडि कै) अनन्द साहिब की पहली पांच पउड़ियाँ तथा अन्तिम एक पउड़ी मंदावणी तथा श्लोक महला ५ तेराकीता जातो नाही। ‘सोहिला-यह वाणी रात को सोने के समय पढ़ी जाये।अमृत समय तथा सोदरु समय के नितनेम के उपरान्त अरदास (प्रार्थना) करनी आवश्यक है।.

३. अरदास यह है

-१ औं वाहिगुरु जी की फतह ।।श्री भगौती जी सहाए ।। वार श्री भगौती जी की पातशाही १०।। प्रिथम भगौती सिमरि कै गुर नानक लई धिआए ।। फिर अंगद गुर ते अमरदासु रामदासै होई सहाए ।। अरजन हरिगोबिंद नो सिमरौ श्री हरिराए ।। श्री हरिकिशन धिआईए जिस डिठे सभि दुखि जाए ।। तेग बहादर सिमरिऐ घर नउ निधि आवै धाए ।। सभ थाई होइ सहाइ ।। दसवां पातशाह श्री गुरु गोबिन्द सिंघ साहिब जी, सब थाई होइ सहाइ। दसां पातशाहियां की जोत श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के पाठ दीदार का ध्यान धर के बोलो जी वाहिगुरु !

पाँच प्यारों, चार साहिबजादों, चालीस मुक्तों, हठियों, जपियों, तपियों, जिन्हों ने नाम जपा, बांट कर छका, देग चलाई, तेग वाही, देख कर अनडिठ किया, तिन्हों प्यारों सच्चयारों की कमाई का ध्यान धर कर खालसा जी! बोलो जी वाहिगुरु !

जिन्हों सिंघों सिंघणियों ने धर्म हेत सीस दिये, बंद बंद कटवाये, खोपड़ियां उतरवाईं चर्खियों पर चढ़े, आरे के साथ चिरवाए गए, गुरुद्वारों की सेवा के लिये बलिदान हुए, धर्म नहीं हारा, सिक्खी केसों स्वासों के संग निबाही, तिन्हों की कमाई का ध्यान धर के खालसा जी! बोलो जी वाहिगुरु !!पाँचों तख्तों समूह गुरुद्वारों का ध्यान धर के बोलो जी वाहिगुरु !!

प्रथमे सरबत खालसा जी की अरदास है जी, सरबत खालसा जी को वाहिगुरु, चाहिगुरु, वाहिगुरु चित आवे, चित आवन का सदका सरब सुख होवै, जहां जहां खालसा जी साहिब तहां तहां रक्षा रियायत, देग तेग फतह, बिरद की पैज, पंथ की जीत, श्री साहिब जी सहाए, खालसा जी के बोल बाले, बोलो जी वाहिगुरु !!!

सिक्खों को सिक्खी दान, केस दान, रहित दान, बिबेक दान, विसाह दान, भरोसा दान, दानां सिर दान, नाम दान, श्री अमृतसर जी के रस्नान, चौंकियां, झंडे, बुंगे जुगहु जुग अटल, धर्म का जैकार, बोलो जी वाहिगुरु !!

सिक्खों का मन नीवां, मति ऊँची, मति का रखवाला आप वाहिगुरु ! हे अकाल पुरुख अपने पन्थ के सदा सहाई दातार जी! श्री ननकाणा साहिब तथा अन्य गुरुद्वारों गुरधामों के, जिन से पन्थ को बिछोड़ा गया है, खुले दर्शन दीदार और सेवा सम्भाल का दान खालसा जी को बख्शो।

हे निःमाणों के मान, निःत्राणों के ताण, निःओटों की ओट, सच्चे पिता वाहिगुरु ! आप के हजूर- की अरदास है जी !करने। अक्षर वाधा घाटा, भूल चूक क्षमा करना, सरबत के कारज रासवही प्यारे मिलाना जिन के मिलने से तेरा नाम चित आवै। नानक नाम चढ़दी कला। तेरे भाणे सरबत का भला।

  • यहां उस वाणी का नाम लो, जो पढ़ी गई है, या जिस कार्य के लिए एकत्र हुए हो या संगत का समागम हुआ हो, उस का वर्णन उचित शब्दों में किया जाए।
  • इस अवसर पर अथवा दीवान की समाप्ति पर जो अनन्द साहिब का पाठ किया जाता है उसका अभिप्राय केवल गुरु से मिलाप के लिए हर्ष और धन्यवाद प्रगट करना होता है।** अरदास किसी भी भाषा में लिखी जाये उसकी शब्दावली नहीं बदलनी है। अरदास के शब्दों को वैसा ही हिन्दी में लिखना पढ़ना चाहिये।***
  • यह अरदास का स्वरूप है। प्रिथम भगौती’ वाले शब्द में और नानक नाम वाली अन्तिम दो पंक्तियों में कोई तबदीली नहीं हो सकती।

इस के उपरान्त अरदास में शामिल होने वाली सब संगत गुरु ग्रन्थ साहिब जी के सामने आदर से जमीन पर शीश रख कर नमस्कार करे और फिर खड़े होकर वाहिगुरु जी का खालसा वाहिगुरु जी की फतह बुलाये। उपरान्त ‘सति श्री अकाल’ का जयकारा गजाया (घोषित किया) जाये।

(ख) अरदास होते समय संगत में उपस्थित सभी स्त्री-पुरुष हाथ जोड़ कर खड़े रहें। जो सज्जन गुरु ग्रन्थ साहिब की सेवा में (ताबे) बैठा हो वह भी उठ कर चंवर झुलाता रहे।

(ग) अरदास करने वाला गुरु ग्रन्थ साहिब जी के सन्मुख खड़ा होकर और हाथ जोड़ कर (वन्दना के भाव में) अरदास करे। यदि गुरु ग्रन्थ साहिब जी वहां उपस्थिति न हों तो किसी ओर भी मुँह करके अरदास की जा सकती है।

(घ) जब कोई विशेष अरदास किसी एक अथवा एक से अधिक व्यक्तियों की ओर से हो तो उनके बिना संगत में बैठे अन्य लोगों का उठना आवश्यक नहीं।

४. सिक्ख संगति में मिल कर गुरुबाणी का अभ्यास

गुरुद्वारे

(क) गुरुबाणी का प्रभाव सिक्ख संगति में अधिक होता है। इस लिये सिक्ख के लिये उचित है कि वह सिक्ख-संगति के दीवानों तथा गुरुद्वारों में उपस्थित होकर दर्शन करे और साध-संगति में बैठ कर गुरुबाणी का लाभप्राप्त करे।

(ख) गुरुद्वारे में गुरु ग्रन्थ साहिब जी का प्रकाश नित्य प्रति हो। बिना किसी विशेष कारण के रात्रि को प्रकाश न रहना चाहिए। साधारणत : रहरासि के पाठ के बाद ‘सुखासन’ किया जाये। जब तक ग्रन्थी या सेवादार गुरु ग्रन्थ साहिब की सेवा के लिये उपस्थित रह सके पाठियों तथा दर्शन करने वालों का आना-जाना जारी रहे, अथवा किसी प्रकार के अ-सत्कार की आशंका न हो, तब तक प्रकाश रहे, तंदुपरान्त सुखासन कर देना उचित है। जिस से बेअदबी न हो।

ग) श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी का प्रकाश, पाठ अथवा सुखासन सम्मान पूर्वक किया जाये। प्रकाश के लिए आवश्यक है कि स्थान शुद्ध और स्वच्छ हो। ऊपर ‘चांदनी’ तनी रहे। प्रकाश ‘मंजी’ साहिब पर स्वच्छ एवं शुद्ध वस्त्र बिछा कर किया जावे। श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी का सुचारु ढंग से प्रकाश करने के लिए गदेले आदि वस्तुओं का उपयोग किया जाये और (ऊपर के लिए रुमाल हो। जब पाठ न हो रहा हो तब) ऊपर रुमाल बिछा रहे। प्रकाश के समय में चंवर भी होना चाहिये।

(घ) उपयुक्त सामान के अतिरिक्त धूप-दीप आदि जला कर आरती करना, भोग लगाना, ज्योति जगाना, घंटे बजाना आदि कर्म गुरुमत के अनुकूल नहीं हैं। हाँ, स्थान को सुगंधित तथा सुवासति बनाने के लिए फूलमालाएं, धूप आदि सुगंधित द्रव्यों को व्यवहार में लाना विवर्जित नहीं। कमरे में रोशनी के लिए तेल, घी या मोम-बत्ती, बिजली, अथवा लैम्प आदि जला लेना चाहिये।

(ङ) श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी की बराबरी में किसी अन्य पुस्तक की स्थापना न की जाये। गुरुद्वारे में मूर्ति पूजा अथवा अन्य गुरुमत-विरुद्ध किसी रीति या संस्कार को न किया जाये; न ही किसी अन्य मत का त्योहार मनाया जाये। हां, किसी अवसर विशेष अथवा एकत्रित समूह को, गुरुमत प्रचार के लिये उपयोग में ले आना अनुचित नहीं।

(च) श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के ‘पंग’ के पावों की मुठ्ठी चापी करना तथा दीवारों व चबूतरों पर नाक रगड़ना, उनकी मुड्डी चापी करना, मंजी साहिब के तले पानी रखना गुरुद्वारों में मूर्तियां (बुत) बनाना अथवा रखना आदि कर्म ‘मनमति’ के हैं।

(छ) एक स्थान से दूसरे स्थान तक श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी को ले जाते समय अरदास करनी चाहिये। जिस गुरसिक्ख के सिर पर श्री गुरु ग्रन्थ साहिब की सवारी हो, उसे नंगे पाँव चलना चाहिए। यदि किसी अवसर पर जूता पहनना अनिवार्य हो तो भ्रम नहीं करना चाहिये।

(ज) श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी का प्रकाश अरदास करके ही किया जाये। प्रकाश करते समय श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी में से शब्द का वाक्य लिया जाये।

(झ) जब श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी की सवारी आए, तो भले ही पहले भी प्रकाश किया हुआ हो (अथवा न हुआ हो) प्रत्येक सिक्ख को सम्मानार्थ उठ कर खड़े होना चाहिये।

(ट) गुरुद्वारे के अन्दर जाते समय जूता बाहर उतार कर और पाँव धो कर, स्वच्छ होकर अन्दर जाना चाहिये। यदि पाँव गंदे अथवा मैले-कुचैले न भी हों तो भी जल के साथ धो लेने चाहियें।परिक्रमा, श्री गुरु ग्रन्थ साहिब अथवा गुरुद्वारे को अपनी दाहिनी ओर रखते हुए करनी चाहिये।

(ठ) गुरुद्वारे के अंदर दर्शन के लिये जाने की किसी देश, मजहब अथवा जाति के व्यक्ति को मनाही नहीं, परन्तु उस के पास सिक्ख-धर्म द्वारा विवर्जित. (तंबाकू आदि) कोई वस्तु न होनी चाहिये।

(ड) गुरुद्वारे के भीतर जा कर सिक्ख का पहला कर्म श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के सामने पृथ्वी पर शीश रख कर नमस्कार करना है। उपरान्त गुरु-रूप संगत का दर्शन करके नम्र स्वर में ‘वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतह’ बुलाई जाये।

(ढ) संगत में बैठने के लिये भी सिक्ख असिख, छूत-छात, जात-पात, ऊँच-नीच का भ्रम या भेद-भाव नहीं मानना।

(ण) किसी मनुष्य का सतगुरु के प्रकाश के समय अथवा संगत में गद्वी, आसन, कुर्सी, चौकी, चारपाई आदि बिछा कर अथवा किसी और विलक्षण ढंग से बैठना ‘मनमत’ है। उसकी आज्ञा नहीं।

(त) संगत में अथवा सतगुरु के हजूर किसी सिक्ख को नंगे सिर नहीं बैठना चाहिये। संगत में सिक्ख स्त्रियों के लिये पर्दा करना अथवा घूंघट निकालना गुरुमत के विरुद्ध है।

(थ) तख्त पाँच हैं-यथा :

१. श्री अकाल तख्त साहिब, अमृतसर,

२. श्री पटना साहिब,

३. श्री केशगढ़ साहिब, अनन्दपुर,

४. श्री हजूर साहिब, नांदेड़ तथा

५. श्री दमदमा साहिब, तलवण्डी साबो।

(द) तख्तों के खास स्थान पर केवल ‘रहत-वान’ अमृतधारी (सिंघ व सिंघनी) ही चढ़ सकते हैं।तख्तों पर पतित और तनखाहिये सिक्ख के बिना हर एक प्राणी मात्र, सिक्ख अथवा गैर-सिक्ख की अरदास हो सकती है।

(ध) प्रत्येक गुरुद्वारे में निशान साहिब’ (झण्डा) किसी ऊँचे स्थान पर स्थित होना चाहिये। निशान साहिब की पोशाक का रंग वसन्ती या सुरमई हो और निशान साहिब के ऊपर ‘सर्व-लोह’ का एक खंडा अथवा बरछा लगा हो।

(न) गुरुद्वारे में एक नगाड़ा हो जो यथा अवसर बजाया जाता रहे।

कीर्तन

(क) संगत में कीर्तन करने का अधिकार केवल अमृतधारी सिक्ख ही

(ख) ‘कीर्तन’ गुरुबाणी को रागों में उच्चारण करने को कहते हैं।

(ग) संगत में कीर्तन केवल गुरुबाणी का अथवा उसकी व्याख्या स्वरूप रचना भाई गुरदास जी और भाई नन्द लाल जी की बाणी का हो सकता है।

(घ) शब्दों को जोटियों के ढंग पर अथवा रागों द्वारा गाते हुए अन्य मन घड़त अधिक तुकें लगा कर, धारना (स्थाई) बनाना अथवा गाना अनुचित है। शबद में ‘रहाउ’ की पंक्ति को ही स्थाई बनाया जाये।

हुक्म लेना

(क) श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के सम्मुख शीश झुकाना गुरु रूप संगत का सत्कार-पूर्वक दर्शन करना, और (आवाजा लेना या सुनना) गुरु ग्रन्थ साहिब के शबद-वाक्य का पाठ करना व सुनना ही सतिगुरु का दर्शन है। ‘वाक्य लेने’ के अतिरिक्त गुरु ग्रन्थ साहिब जी के रुमाल को उठा-उठा कर ‘दर्शन’ करना या कराना निषिद्ध और मनमत है।

(ख) संगत में एक ही समय एक ही कार्य होना उचित है, कीर्तन हो या कथा, व्याख्यान हो या पाठ।

(ग) दीवान के अवसर पर संगत में गुरु ग्रन्थ साहिब जी की ताबे केवल सिक्ख (पुरुष अथवा स्त्री) ही बैठने का अधिकारी है।

(घ) संगत को पाठ केवल सिक्ख ही सुनाये। अपने आप के लिये पाठ कोई गैर-सिक्ख भी कर सकता है।

(ङ) हुक्म लेते समय बाईं ओर के पृष्ठ (पन्ने) पर जो पहला शबद चल रहा हो उसे आरम्भ से पढ़ना चाहिये। यदि शबद का आरम्भ पिछले पन्ने से होता हो तो पन्ना पलट कर पढ़ना शुरु करें और पूरा शबद पढ़े। यदि वार हो तो पउड़ी के सारे श्लोक और पउड़ी पढ़नी चाहिये। शब्द के अन्त में जहाँ नानक पद आ जाये, उस तुक पर समाप्ति करनी चाहिये।

(च) दीवान की समाप्ति पर भी अरदास होगी और हुक्म लिया जायेगा।

साधारण पाठ

(क) प्रत्येक सिक्ख को, यथा-सम्भव, अपने घर में श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के प्रकाश करने के लिये अलग और एकांत स्थान नियत करना चाहिये।

(ख) प्रत्येक सिक्ख स्त्री-पुरुष, बालक-बालिका को गुरुमुखी पढ़ कर श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी का पाठ करना सीखना चाहिये।

(ग) प्रत्येक सिक्ख अमृत वेला में प्रसाद छकने (भोजन खाने) से पहले श्री गुरु ग्रन्थ साहिब का ‘हुकम’ ले। यदि किसी कारणवश इसमें चूक हो जाये तो दिन में किसी समय गुरु ग्रन्थ साहिब का पाठ अवश्य करें अथवा सुनें। यात्रा आदि में, किसी कारण विशेष से, यदि दर्शन न कर सकें तो शंका नहीं करना चाहिये।

(घ) अच्छा तो यह है कि प्रत्येक सिक्ख गुरु ग्रन्थ साहिब का साधारण पाठ जारी रखे और महीने दो महीने बाद या (जितने समय में संभव हो) समाप्त करे।

पाठ आरम्भ करते समय आनन्द साहिब की (पहली पाँच पउड़ियों और एक अन्त की पउड़ी) के पाठ के उपरान्त अरदास करके हुक्म लेना चाहिये, फिर जपु जी साहिब का पाठ करना चाहिये।

अखण्ड पाठ

(क) अखण्ड पाठ किसी संकट अथवा हर्ष के अवसर पर किया जाता है। यह लगभग ४८ घण्टों में सम्पूर्ण किया जाता है। इस में पाठ लगातार अखण्ड (बिना रोक के) किया जाता है। पाठ स्पष्ट और शुद्ध हो। बहुत तेज़ पढ़ना जिस से सुनने वाला कुछ समझ न सके, गुरुवाणी का अपमान है। अक्षर तथा मात्रा का ध्यान रख कर पाठ शुद्ध और स्पष्ट होना चाहिये; चाहे समय कुछ अधिक लग जाये ।

(ख) अखण्ड पाठ जिस परिवार अथवा संगत ने करना हो, वह स्वयं करे; कुटम्ब के व्यक्ति, सगे-सम्बन्धी, मित्र आदि मिल कर करें। पाठियों की संख्या नियत नहीं।यदि कोई मनुष्य स्वयं पाठ नहीं कर सकता तो किसी अच्छे पाठी से सुने, पर यह न हो कि पाठी अकेला बैठा पाठ करता रहे और संगत अथवा कुटम्ब का कोई आदमी सुन ही न रहा हो। पाठी की यथा शक्ति भोजन, वस्त्र आदि से उचित सेवा की जाये।

(ग) अखण्ड पाठ व और किसी प्रकार के पाठ के समय कुम्भ, ज्योति, दीपक, नारियल रखना, अथवा उस के साथ-साथ व मध्य में किसी अन्य वाणी का पाठ जारी रखना, मनमत है।

पाठ का आरम्भ

साधारण पाठ के आरम्भ के अवसर पर प्रसाद कर के अनन्द साहिब (छः पउड़ियों) का पाठ करके अरदास हो। बाद में ‘हुक्म’ लिया जाये। फिर पाठ का आरम्भ हो। 15अखण्ड पाठ के समय कड़ाह-प्रसाद हो, उपरांत अनन्द साहिब (छः पउड़ियों) के पाठ के बाद अरदास करके तथा ‘हुक्म’ लेकर पाठ का आरम्भकिया जाये।

भोग (समाप्ति)

क) गुरु ग्रन्थ साहिब जी के पाठ (साधारण अथवा अखण्ड) का भोग मुंदावणी अथवा रागमाला पढ़ कर, प्रचलित स्थानक रीति के अनुसार, डाला जाये। (इस बात पर पंथ में अभी तक मतभेद है, अतः रागमाला के बिना गुरु-ग्रन्थ साहिब की बीड़ लिखने व छपवाने का साहस कोई न करे) इस के बाद अनन्द साहिब का पाठ करके भोग (समाप्ति) की अरदास की जाये और कड़ाह-प्रसाद बाँटा जाये।

ख) भोग (समाप्ति) के अवसर पर श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी की आवश्यकता अनुसार रुमाल, चंवर, चांदनी आदि भेंट किये जाएं और पन्थिक कार्यों के लिये यथा शक्ति ‘अरदास’ कराई जाये।

कड़ाह प्रसाद

(क) कड़ाह प्रसाद, जो विधि के अनुसार तैयार करके अथवा बनवा कर लाया जाये, संगत में वही स्वीकृत होगा।

(ख) कड़ाह-प्रसाद तैयार करने की विधि इस प्रकार है:-शुद्ध पात्र त्रिभावली (आटा, उत्तम मीठा और घी बराबर वज़न के डाल कर) गुरु बाणी का पाठ करते हुए प्रसाद तैयार किया जाये। फिर स्वच्छ वस्त्र के साथ ढक कर श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के हजूर स्वच्छ चौकी पर रखा जाये। श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के हजूर संगत को ऊँची आवाज़ में सुनाते हुए, अनन्द साहिब की पहली पांच पउड़ियों तथा अन्त की एक पउड़ी का पाठ किया जाये और अरदास की जाए। उपरांत स्वीकृति के लिए कृपाण भेंट किया जाये।

(ग) तदनन्तर संगत में बांटने से पहले कड़ाह-प्रसाद में से पाँच प्यारों का ‘गफ्फा’ निकाल कर बाँटा जाये। उपरान्त संगत में प्रसाद बाँटते समय पहले ताबे बैठे सिंघ को किसी कटोरे अथवा कटोरी में डाल कर दें और फिर बाकी संगत को बाँटे। किसी का लिहाज अथवा घृणा करके कोई भेद-भाव न करें, सब सिक्ख असिक्ख, जाति विजाति वाले को एक जैसा बाँटे। कड़ाह प्रसाद बाँटते समय संगत में बैठे किसी मनुष्य के साथ जात-पात व छूत-छात के विचार से ग्लानि का व्यवहार नहीं करना चाहिये।

(घ) कड़ाह प्रसाद भेंट चढ़ाते समय कम से कम एक टका नकद भी अरदास होना चाहिए।

  • एक बार अनंद साहिब का पाठ हो चुकने के बाद यदि फिर कड़ाह-प्रसाद की देग आ जाये तो अनंद साहिब का पाठ बार-बार नहीं करना चाहिये, कृपाण भेंट करना ही पर्याप्त है।

५. गुरुबाणी की कथा

(क) संगति में गुरुबाणी की कथा सिक्ख ही करे।

(ख) कथा का अभिप्राय गुरुमत का प्रचार ही हो।

(ग) कथा गुरु साहिबान की वाणी, अथवा भाई गुरुदास, भाई नन्द लाल व किसी और प्रामाणिक पन्थिक या इतिहास की पुस्तकों की (जो गुरुमत के अनुकूल हों) हो सकती है परन्तु अन्य मत की किसी पुस्तक की नहीं हो सकती। हां, प्रमाण किसी महात्मा या पुस्तक की उत्तम शिक्षा का दिया जा सकता है।

(६) व्याख्यान-गुरुद्वारे में गुरुमत के विरुद्ध कोई व्याख्यान नहीं हो सकता ।है:-

(७) गुरुद्वारे में संगति का कार्य-कर्म साधारणत इस प्रकार होताश्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी का प्रकाश, कीर्तन, कथा, व्याख्यान, अनन्द साहिब, अरदास, फतह, सति श्री अकाल का जयकारा और ‘हुक्म’।

२. गुरुमत की रहणी (आचार)

१) सिक्ख की साधारण रहणी, कृत्य-कर्म गुरुमत के अनुसार हों। गुरुमत यह है-

(क) एक अकाल पुरख के अतिरिक्त किसी अन्य देवी देवता की उपासना नहीं करनी।

(ख) अपना मुक्ति-प्रदाता और इष्ट केवल दस गुरु साहिबान तथा श्री गुरु ग्रन्थ साहिब अथवा गुरु साहिबान की बाणी को मानना।

(ग) दस गुरु साहिबान को एक ज्योति का प्रकाश, एक ही स्वरूप करके मानना।

(घ) जात-पात, छूत-छात, जन्त्र-मन्त्र, शकुन-अपशकुन, तिथि-मुहूर्त, ग्रह, राशि, श्राद्ध, पितृ-कर्म, पिंड-पत्तल, दिया बाती करना, क्रिया-कर्म, होम, यज्ञ, तर्पण, शिखा-सूत्र, भद्वण, एकादशी, पूर्णमाशी आदि के व्रत, तिलक, जनेऊ, तुलसी माला, गोर, मठ, मढ़ी, मूर्ति-पूजा आदि भ्रम रूप कर्मों पर विश्वास नहीं रखना चाहिये।गुरु-स्थानों के बिना किसी अन्य धर्म के तीर्थ अथवा धाम को अपना धर्म-स्थान नहीं मानना ।पीर, ब्राह्मण, ज्योतिषी, मन्नत मानना, शिरीनी बाँटना; वेद, शास्त्र, गायत्री, गीता, कुरान, अंजील आदि पर विश्वास नहीं रखना। हां, परिचय प्राप्ति के लिये अन्य मतों के ग्रन्थों को पढ़ने में दोष नहीं।

(ड) खालसा सब मतों से न्यारा रहे, पर किसी अन्य धर्म वाले का मन न दुखाए।

(च) प्रत्येक काम करने से पहले वाहिगुरु के आगे अरदास करे।

(छ) सिक्ख के लिए गुरमुखी विद्या का पढ़ना आवश्यक है; अन्य विद्याएं भी आवश्यकता अनुसार सीखे।

(ज) सन्तान को सिक्ख धर्म की विद्या दिलाना प्रत्येक सिक्ख का कर्त्तव्य है।

(झ) केश लड़के लड़की के जो जन्म समय के हों, उन का बुरा न मनाए। केश वही रखे। सिक्ख अपने लड़के लड़कियों के केश न कटाये; नाम के आगे सिंघ तथा कौर लगाये।

(ञ) सिक्ख भांग, अफीम, शराब, तम्बाकू आदि नशा देने घाली वस्तुओं का सेवन न करे। अमल भोजन का ही रखे।मना है।

(ट) सिक्ख के लिए (पुरुष हो अथवा स्त्री) नाक, कान आदि छेदनारखे।

(ठ) गुरु का सिक्ख कन्या न मारे। ‘कुड़ी मार’ के साथ व्यवहार न रखे।

(ड) गुरु का सिक्ख धर्म के अनुकूल कृत्य-कार्य (रोजी) करके निर्वाह

(द) गुरु का सिक्ख गरीब की रसना को गुरु की गोलक जाने।

(ण) चोरी-यारी न करे, जूआ न खेले।

(त) पर बेटी को बेटी जानै।

पर स्त्री को मात बखानै ।

निज स्त्री सों रति होई।

रहितवंत सिंघ है सोई।

इसी प्रकार सिक्ख स्त्री अपने पतिव्रत धर्म में दृढ़ रहे।

(थ) गुरु का सिक्ख जन्म से लेकर देहांत तक गुरु-मर्यादा का पालन

करे।

(द) सिक्ख सिक्ख को मिलते समय ‘वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतह’ बोल कर अभिवादन करे; पुरुष तथा स्त्री दोनों के लिये यही आज्ञा है।

(ध) सिक्ख स्त्रियों के लिए परदा व घूंघट करना उचित नहीं।

(न) सिक्ख के लिए कच्छहरे और दसतार के अतिरिक्त पोशाक सम्बन्धी और कोई पाबन्दी नहीं। सिक्ख स्त्री सिर पर दसतार सजाये अथवा न सजाये, दोनों ठीक हैं। कच्छहरा अवश्य पहनना चाहिये।

१. जन्म तथा नामकरण संस्कार

(क) गुरु-सिक्ख के गृह में बालक के जन्मोपरान्त जब माता उठने-बैठने तथा स्नान करने के योग्य हो जाये तो (दिनों की संख्या का कोई बंधन नहीं) परिवार और सम्बन्धी गुरुद्वारे में कड़ाह प्रसाद अर्पण करें और गुरु महाराज जी के हजूर ‘परमेसरि दिता बन्ना’ (सोरठि म. ५) ‘सतिगुरि साचै दीआ भेजि’ (आसा म. ५) आदि हर्ष और धन्यावाद के शबद पढ़ें सुनें। उपरान्त यदि श्री गुरु ग्रन्थ साहिब का पाठ रखा हो तो पाठ की पूर्णता की जाये। फिर वाक्य (हुक्म) लिया जाये। वाक्य के आरम्भ के शब्द का जो पहला अक्षर हो उस से ग्रन्थी सिंघ बालक का नाम तजवीज़ करे और संगत की स्वीकृति से नाम प्रकट करे। लड़के के नाम के साथ सिंघ’ पद और लड़की के नाम के साथ ‘कौर’ पद लगाया जाये।

उपरान्त अनन्द साहिब (छः पउड़ियां) पढ़ कर बालक के नामकरण संस्कार पर हर्ष सूचक शब्दों में अरदास करके कड़ाह प्रसाद बाँटा जाये।

(ग) जन्म के सम्बन्ध में कोई वस्तु खाने-पीने के विषय में, सूतक के विचार से, कोई भ्रम नहीं करना, क्योंकि आज्ञा है:-

जंमणु मरणा हुकमु है भाणै आवै जाइ ।।

Adla di va

खाणा पीणा पवित्रु है दितोनु रिजकु संबाहि ।।

(घ) श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के रुमाल का चोला बना कर पहनना-पहनाना आदि मनमत है।

२. आनन्द सस्कार

(क) सिक्ख स्त्री-पुरुष का विवाह जाति-पाति गोत्रादि का विचार किये बिना होना चाहिये।

(ख) सिक्ख की पुत्री का विवाह सिक्ख के साथ ही हो।

(ग) सिक्ख का विवाह ‘आनन्द’ की रीति अनुसार करना चाहिये।

(घ) लड़की लड़के का विवाह बचपन में करना विवर्जित है।

(ङ) जब कन्या, शरीर, मन और आचार की दृष्टि से विवाह के योग्य हो जाये तो किसी योग्य सिक्ख के साथ ‘आनन्द’ पढ़ाया जाये।

(च) आनन्द से पहले मंगनी की रस्म आवश्यक नहीं, परन्तु यदि मंगनी करनी हो, तो कन्या वाले किसी दिन संगत को एकत्रित करें और गुरु ग्रन्थ साहिब जी के सम्मुख अरदास करके एक कृपाण, कड़ा और कुछ मिठाई वर के पल्ले में डाल दें।

(छ) आनन्द का दिन नियत करते समय किसी तिथि-वार अथवा भले-बुरे दिन की विचार करने के लिए पत्री बाचना मनमत है। कोई दिन भी जो दोनों पक्ष वालों को, परस्पर विचार से अच्छा मालूम हो, नियत कर लेना चाहिये।

(ज) सेहरा व मुकुट बांधना अथवा कंकण बांधना, पितृ-पूजन, कच्ची-लस्सी में पाँव डालना, बेरी अथवा जण्डी काटना, घड़ोली भरना, रूठ जाना, छन्द पढ़ना, हवन करना, वेदी गाडना, वेश्या का नाच, शराब आदि का व्यवहार मनमत है।

(झ) जितने (थोड़े से थोड़े) व्यक्तियों की कन्या पक्ष वाले मांग करें, उतने साथ लेकर लड़का ससुराल में जाये। दोनों ओर गुरुवाणी के शबद गाये जायें और फतह बुलाई जाये।

(ञ) विवाह के अवसर पर श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के हजूर दीवान लगे, रागी या संगत कीर्तन करे। फिर लड़की श्री गुरु ग्रन्थ साहिब की हजूरी में बिठाई जाये। लड़की लड़के की बायीं तरफ बैठे। संगत की आज्ञा लेकर वर और क्या तथा उनके माता-पिता अथवा संरक्षक/अभिभावकों को खड़े करके आनन्द के आरम्भ की अरदास की जाए।

फिर वर-कन्या को गुरुमत अनुसार गृहस्थ धर्म कर्त्तव्यों का उपदेश

किया जाए :-

पहले दोनों को संयुक्त उपदेश दें। इस में सूही राग की ‘लावों’ के भाव के अनुसार पति-पत्नी के सम्बन्ध को, जीवात्मा और परमात्मा के प्रेम के अनुरूप ढालने की विधि बताई जाए।

परस्पर प्रेम द्वारा ‘एक जोति दुइ मूरती’ होना बताया जाये और इस प्रकार गृहस्थ-धर्म को निभाते हुए अपने संयुक्त-स्वामी श्री अकाल-पुरुख में श्रद्धालीन होने की शिक्षा दी जाए। दम्पति ने इस संयोग को मानव-जीवन की यात्रा को सफलता पूर्वक निर्वाह का साधन बनाना है क्योंकि दम्पति को इस संयोग द्वारा पवित्र और गुरुमुख जीवन व्यतीत करना है।

उपरान्त वर कन्या को अलग-अलग अपने गृहस्थ धर्म के कर्त्तव्य बताये जाएं।

वर को बताया जाये कि कन्या पक्ष वालों ने आप को ही अधिक योग्य समझ कर ‘वर’ चुना है। आप ने अपनी पत्नी को अर्धाङ्गनी जान कर सब अवस्थाओं में एक सा तथा सदव्यवहार करना है, बाँट कर खाना है। इस केशरीर तथा इज्जत के संरक्षक आप हैं। स्त्रीव्रत-धर्म में दृढ़ रहना। इस के माता-पिता तथा सम्बन्धियों को अपने माता-पिता और सम्बन्धियों के तुल्य सम्मान, आदर देना।

कन्या को बताया जाये कि श्री गुरु ग्रन्थ साहिब और संगत की उपस्थिति में इस सज्जन के साथ प्रणय के बन्धनों में बांधा जाता है। इन के निर्मल भउ’ (पवित्र भाव) में रहते हुए इन को ही अपने सारे प्रेम और श्रद्धा का स्वामी समझना, दुःख सुख, देश विदेश में अपने पतिव्रत धर्म में दृढ़ रहना, सेवा करना। इन के माता-पिता तथा सम्बन्धियों को अपने माता-पिता तथा सम्बन्धियों की तरह मानना।

उपदेश की बातें स्वीकार करते हुए वर तथा कन्या दोनों श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के सामने माथा टेकें। फिर कन्या का पिता अथवा कोई अन्य प्रमुख सम्बन्धी वर का पल्लू कन्या के हाथ में दे और ताबे बैठा सज्जन सूही महला ४ में दी हुई लावों का पाठ सुनाए। एक-एक लांव का पाठ होने के बाद आगे वर और पीछे कन्या, वर का पल्लू हाथ में लिए, श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी की चार परिक्रमा की समाप्ति करें। परिक्रमा करते समय रागी अथवा संगत लावों को क्रम अनुसार संगीत-स्वर में गाते जायें और वर-कन्या प्रत्येक लांव के बाद माथा टेक कर अगली लांव सुनने के लिए खड़े हो जाये। फिर चारों लांवों के समाप्त होने पर माथा टेक कर अपने स्थान पर बैठ जायें। रागी अथवा ग्रंथी सिंघ अनन्द साहिब की पहली पाँच पउड़ियों और अन्तिम एक पउड़ी का पाठ करें। उपरान्त अनन्द की अरदास करके कड़ाह प्रसाद का वितरण किया (वरताया) जाये।

(ट) आनन्द की रीति से अन्य-मत वालों का विवाह नहीं हो सकता। (ठ) लड़के अथवा लड़की का संयोग पैसा लेकर न करें।

(ड) ‘यदि बालिका के माता-पिता कदाचित् संयोग से कभी बालिका के घर जायें और वहां प्रसाद तैयार हो तो निः संकोच खायें। भोजन न खाना आदि अज्ञान है। खालसे को खाना-पिलाना गुरु बाबा अकाल पुरुख ने प्रदान गुरु ने दोनों नाते समान किये हैं’।* किया है। बेटी और बेटे वाले परस्पर मिल कर खाते पीते रहें; इस लिए कि

(ढ) जिस स्त्री का भर्ता कालवश हो जाये, वह चाहे तो योग्य वर देख आज्ञा है। कर पुर्नविवाह कर ले। सिक्ख की स्त्री मर जाये तो उसके लिए भी यही

गई है।

(ण) पुनर्विवाह की भी बही रीति है जो ‘आन्नद’ के लिए

(त) साधारण अवस्था में सिक्ख को एक के होते दूसरा विवाह नहीं पर बताई करना चाहिये।

(थ) अमृतधारी सिंघ को चाहिये कि वह अपनी सिंघनी को पान करा ले ।

३. मृतक-संस्कार

(क) प्राणी को, मृत्यु के समय, यदि वह खाट पर हो तो खाट से नीचे नहीं उतारना। दीया-बाती, गोदान अथवा कोई मनमत-संस्कार नहीं करना; के वल गुरुबाणी का पाठ करना अथवा वाहिगुरु-वाहिगुरु का जाप करना।

(ख) प्राणी के देह त्यागने पर धाड़ मार कर नहीं रोना, छाती नहीं पीटना, स्यापा नहीं करना, मन को वाहिगुरु की रज़ा में राज़ी रखने के लिये गुरुबाणी का पाठ और वाहिगुरु का जाप करते रहना।

(ग) प्राणी चाहे छोटी से छोटी आयु का हो उसकी भी दाह-क्रिया होनी चाहिये। जहां दाह-क्रिया का प्रबन्ध न हो सके वहां शव को जल-प्रवाह करने अथवा अन्य विधि काम में लाने पर शंका नहीं करनी।

(घ) दाहकर्म के लिए दिन अथवा रात का कोई भ्रम नहीं करना।

(ङ) मृत देह को स्नान करा कर स्वच्छ वस्त्र पहनाए जायें और ककार अलग न किये जायें। फिर अर्थी पर डाल कर अन्तिम यात्रा की अरदास की जाये और अर्थी को उठा कर शमशान भूमि की ओर ले जायें। साथ में वैराग्यमय गुरुबाणी पढ़ते जायें। दाह के स्थान पर पहुंच कर चिता बनाई जाये और देह को अग्नि-भेंट करने के लिए अरदास की जाये। देह को चिता पर रख कर पुत्र अथवा कोई अन्य सम्बन्धी या हितु आदि अग्नि दे। संगत कुछ दूरी पर बैठ कर कीर्तन करे अथवा वैराग्यमय शब्द पढ़े। जब चिता अच्छी तरह जल उठे तो (कपाल क्रिया आदि करना मनमत है) कीर्तन सोहिले का पाठ और अरदास करके संगत वापिस लौट आए।

घर आकर अथवा पास के किसी गुरुद्वारे में प्राणी के निमित्त गुरु ग्रन्थ साहिब जी का पाठ रखा जाये और अनन्द (६ पउड़ियों) का पाठ कर के कड़ाह-प्रसाद बाँटा जाये। इस पाठ की समाप्ति दसवें दिन हो यदि दसवें दिन न हो सके तो और कोई दिन बिरादरी के सहूलियत को मुख्य रखते हुए नियत कर लिया जाये। पाठ करने में घर के लोग और सम्बंधी मिल कर भाग लें। यदि हो सके, तो प्रत्येक रात्रि को कीर्तन भी हो। दसवें के पीछे मृतक – संस्कार की कोई रस्म बाकी नहीं रहती।

(ग) मृत-प्राणी की चिता ठंडी होने पर भस्म को अस्थियों समेत उठा कर चलते जल में प्रवाहित कर दिया जाये अथवा ज़मीन में गाढ़ कर जमीन को बराबर कर दिया जाये। संस्कार स्थान पर मृत-प्राणी की यादगार बनाना मना है।

(घ) अर्द्ध-मार्ग, स्यापा, फूहड़, दीया, पिण्ड, क्रिया, श्राद्ध, बूढ़ा-मरना आदि क्रियाएं मनमत है। चिता से अस्थियां उठा कर गंगा, पातालपुरी, कीरतपुर साहिब आदि स्थानों पर जाकर डालना मनमत है।

४. अन्य रीतियां

इन संस्कारों के अतिरिक्त समय-समय पर जो भी हर्ष अथवा शोक का अवसर आ उपस्थित हो (जैसे नये मकान में प्रवेश करना, नई दुकान खोलना, बालक को पाठशाला भेजना आदि) तो सिक्ख को चाहिये कि वाहिगुरु से सहायता की याचना करते हुए अरदास करे। सिक्खों में सभी संस्कारों का आवश्यक अंग बाणी का पाठ तथा अरदास है।

३. सेवा

(१) सेवा सिक्ख धर्म का एक महत्वपूर्ण अंग है। इस की व्यावहारिक शिक्षा के लिए गुरुद्वारों में ही प्रबन्ध किया जाता है। इस के साधारण रूप ये हैं:- गुरुद्वारे में झाडू तथा लीपा पोती, संगत की पानी, पंखे आदि से सेवा, लंगर की सेवा, जूते साफ करना इत्यादि ।

(क) गुरु का लंगर :-

इस के दो अभिप्राय हैं-एक सिक्खों को सेवा सिखाना। दूसरा ऊँच-नीच, छूत-छात का भ्रम मिटाना।

(ख) गुरु के लंगर में बैठ कर अमीर-गरीब ‘ऊँच-नीच’ किसी भी जाति या वर्ण का प्राणी समान भाव से भोजन पा सकता है। पंक्ति में बिठाते समय किसी देश, वर्ण, जाति, मज़हब का भेद-भाव नहीं किया जा सकता।

हां, एक ही पात्र में केवल अमृतधारी सिक्ख ही भोजन छक (खा) सकते हैं।

पन्थिक रहनी (आचार)

(१) गुरु पन्थ

(२) अमृत संस्कार

(३) तनखाह (दण्ड) लगाने की विधि

(४) गुरुमता करने की विधि

(५) स्थानक निर्णयों की अपील।

१. गुरु-पन्थ

सेवा केवल पंखे तथा लंगर आदि पर ही समाप्त नहीं हो जाती। सिक्ख का सम्पूर्ण जीवन परोपकारमय है। सफल सेवा वह है जो अल्प प्रयल से अधिक से अधिक हो सके। यह बात संगठन द्वारा हो सकती है। सिक्ख ने व्यक्तिगत-धर्म-निर्वाह के साथ ही पन्थिक कर्त्तव्यों का भी पालन करना है। सिक्ख संगठन का नाम ‘पंन्थ’ है। प्रत्येक सिक्ख ने पन्थ का एक अंग हो कर ही अपने धर्म को निभाना है।

(क) गुरु-पन्थ-गुरु के मार्ग पर चलने वाले अमृतधारी तैयार सिक्खों के समूह को ही ‘गुरु पन्थ’ कहा जाता है। पंथ की रचना दश गुरुओं ने की; दशम गुरु जी ने इसका अन्तिम स्वरूप नियत कर, ‘गुरु पन्थ’ पद सौंपा।

२. अमृत-संस्कार

(क) अमृत छकाने के लिए प्रबंध एक विशेष स्थान पर हो। वहां साधारण जनता का आना-जाना न हो।

(ख) वहाँ श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी का प्रकाश हो। कम से कम छः तैयार-बर-तैयार सिंघ उपस्थित हों, जिन में से एक ताबे (हजूरी) में बैठे और बाकी पाँच अमृत छकाने के लिए हों। इन में सिंघनिआं भी सम्मिलत हो सकती हैं। इन सभी ने सकेश-स्नान किया हो।

(ग) पाँचों प्यारों में कोई अंगहीन (अन्धा, काना, लंगड़ा, लूला) अथवा दीर्घ-रोगी नहीं हो सकता। कोई ‘तनखाहिया’ न हो। सब तैयार-बर-तैयार दर्शनीय सिंघ हों।

(घ) हर देश, कौम, मज़हब और जाति के हर स्त्री-पुरुख को अमृत छकने का अधिकार है, जो सिक्ख धर्म ग्रहण करने और उसके सिद्धांतों पर चलने का प्रण करे।

बहुत अल्पायु भी न हो, होश संभाली हो। प्रत्येक अमृताभिलाषी प्राणी ने सकेश स्नान किया हो और प्रत्येक ने पाँचों ककार (कश, कृपाण गात्रे वाली, कच्छा, कंघा, कड़ा) धारण कर रखे हों। अन्यमत का कोई चिन्ह न हो। सिर नंगा अथवा टोपी न हो। छेदक आभूषण कोई न पहना हो। अदब के साथ हाथ जोड़ कर गुरु जी के सम्मुख खड़े हों।

(ङ) यदि किसी ने कोई कुरहित (दुराचार) करने के कारण दोबारा अमृत छकना हो तो उसको अलग करके, संगत में पाँच प्यारे तनखाह (दण्ड) लगा दें।

(च) अमृत छकाने वाले पाँच प्यारों में से कोई एक सज्जन अमृताभिलाषियों को सिक्ख धर्म के सिद्धांत समझाये कि सिक्ख धर्म में कृत्रिम की पूजा को त्याग कर एक परमात्मा की प्रेमा-भक्ति और उपासना का विधान है, इस की पूर्णता के लिये गुरुबाणी का अभ्यास, साध-संगत तथा पंथ की सेवा-उपकार, ‘नाम’ का प्रेम और अमृत छक कर रहति बनाए रखना मुख्य साधन हैं, और पूछे कि क्या आप इस धर्म को खुशी से स्वीकार करते हैं?

(छ) ‘हां’ में उत्तर मिलने पर प्यारों में से एक सज्जन अमृत की तैयारी की अरदास करके ‘हुकुम’ ले। पाँच प्यारे अमृत तैयार करने के लिए बाटे के निकट आकर बैठें।

(ज) बाटा सर्व लोह का हो, और चौकी, कुंडी आदि किसी स्वच्छ स्थल पर रखा हो।

(झ) बाटे में स्वच्छ जल और पताशे डाले जायें और पाँच प्यारे बाटे के चारों ओर वीरासन जमा कर बैठ जायें।

(ञ) इन बाणियों का पाठ करें:-

हाथ जपु, जापु, १० सवैये (स्रावग सुद्ध समूह) बेनती चौपई ‘हमरी करो दै रच्छा से लेकर दुसट दोख ते लेहु बचाई’ तक) अनन्द साहिब ।

(ट) पाँच प्यारों में से प्रत्येक पाठ करने वाला बायां हाथ बाटे के किनारे पर रखे और दायें से खण्डा जल में घुमाता जाये। मन एकाग्र रहे। शेष प्यारों के हाथ बाटे के किनारों पर और दृष्टि अमृत में जमी हो।

(ठ) पाठ समाप्त हो जाने के बाद पाँच प्यारों में से कोई एक अरदास

करे।

(ड) जिस अमृताभिलाषी ने अमृत की तैयारी के समय पूर्ण संस्कार में भाग लिया है, वही अमृत छकने में सम्मिलत हो सकता है। मध्य में आने वाला नहीं हो सकता।

(ढ) अब श्री कलगीधर दशमेश पिता का ध्यान धर कर प्रत्येक अमृत छकने वाले को वीरासन बिठा कर उसके बायें हाथ पर दायां हाथ रखाकर पाँच चुल्लू अमृत के छकाये जायें और प्रत्येक चुल्लू के साथ कहा जायेः-

बोल ‘वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतह’।

छकने वाला छक कर कहे ‘वाहिगुरु जी का खालसा वाहिगुरु जी की फतह’। फिर पाँच छींटे अमृत के नेत्रों में दिये जाये। उपरान्त पाँच छींटे केशों में डाले जाये। प्रत्येक छींटे पर छकने वाला छकने के बाद ‘वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतह’ बोलता जाये। जो अमृत बाकी रहे उसकी उस एक बाटे से सब अमृत छकने वाले (पुरुख एवं स्त्रियाँ) मिल कर छकें (पियें)।

(ण) तदुपरांत पाँच प्यारे मिल कर एक आवाज़ के साथ अमृत छकने वालों को वाहिगुरु का नाम बतला कर मूल-मंत्र सुनायें और उन से इसका रटन करायें:-

१औं सेति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ।।

(त) फिर पाँचों प्यारों में से कोई सज्जन रहत बताए :-

“आज से आप ने ‘सतिगुरु कै जनमे गवनु मिटाइआ’ है और आप खालसा-पन्थ में शामिल हुए हो। आप का धार्मिक पिता श्री गुरु गोबिन्द सिंघ जी और धार्मिक माता साहिब कौर जी हैं। जन्म आँप का केशगढ़ साहिब का और निवास आनन्दपुर साहिब का है। आप एक पिता के पुत्र होने से आपस में और सारे अमृतधारियों के धार्मिक भाई हैं। आप, पिछला कुल, कृत्य-कर्म, धर्म त्याग कर पिछली जात-पात, जन्म, देश, मज़हब का ख्याल तक त्याग कर शुद्ध खालसा बन चुके हैं। एक अकाल पुरुष के सिवाय किसी देवी, देवता, पैगम्बर की उपासना नहीं करनी। दश गुरु साहिबान और उन की बाणी के अतिरिक्त किसी अन्य को अपना मुक्ति-दाता नहीं मानना । आप गुरुमुखी जानते हो। (यदि नहीं जानते तो सीख लो) और प्रतिदिन कम से कम नित्य-नियम की इन बाणियों का पाठ करना अथवा सुननाः- जपु, जापु, १० सवैये (म्रावग सुद्ध वाले), सोदरु रहिरास और सोहिला। श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी का पाठ करना अथवा सुनना, पाँचों ककार केश, कृपाण,

कच्छार, कंघा, कड़ा को सदैव अंग-संग रखना।

ये चार कुरहतें (दुराचार) (निषिद्ध कर्म) नहीं करनी- (१) केशों की बेअदबी, (२) कुठ्ठा खाना, (३) पर-स्त्री अथवा पर-पुरुष के साथ संभोग करना, (४) तम्बाकू का प्रयोग करना। इन में से कोई कुरहत हो जाये तो फिर से अमृत पान करना पड़ेगा। अपनी इच्छा के विरुद्ध अनायास ही कोई कुरहत जो जाये तो उस के लिए कोई दण्ड नहीं। सिर गुम्म, नड़ी-मार, कुड़ी-मार (जो सिक्ख होकर यह दुष्कर्म करें) का संग नहीं करना। पंथ सेवा और गुरुद्वारों की टहल के लिये तत्पर रहना, अपनी कमाई में से गुरु का दसबंध देना, सब कार्य गुरुमत के अनुसार करने।

खालसा-धर्म के नियमानुसार जत्थेबंदी में एक माला की भान्ति पिरोये रहना। रहत में कोई भूल हो जाये तो खालसा जी के दीवान में उपस्थित हो कर विनती करके तनखाह बखशवाना (क्षमा का याचक होना) और आगे के

लिये सावधान रहना।

१. कृपाण की लंबाई की कोई सीमा नियत नहीं हो सकती।

२. कच्छ किसी कपड़े की भी हो सकती है परन्तु घुटनों से नीची न हो।

३. कड़ा सर्व लोह का हो।

४. ‘कुड्डा’ से ‘से तात्पर्य वह मास है जो मुसलमानों की रीति से कलमा पढ़

कर तैयार किया गया हो।

५. केशधारी होकर जो केश कटा दे।

(थ) तनखाहिये ये हैं:-

(१) मीणे”, मसन्द, धीरमल्लिये, रामराईये आदि पंथ विरोधियों के साथ अथवा नड़ी-मार, कुड़ी-मार, सिर-गुम्म के साथ व्यवहार* करने वाला तनखाहिया हो जाता है।

(२) बे-अमृतिये अथवा पतित का जूठा (अवशिष्ट) खाने वाला।

(३) दाढ़ी रंगने वाला, सफेद बाल चुनने वाला।

(४) पुत्र अथवा पुत्री का नातां धन लेकर अथवा देकर करने वाला।

(५) कोई नशा (भांग, अफीम, शराब, पोस्त, कुकीन आदिक) सेवन

करने वाला।

(६) गुरुमत के विरुद्ध कोई संस्कार करने कराने वाला।

(७) रहत में कोई भूल करने वाला।

‘यह शिक्षा देने के उपरान्त पाँच प्यारों में से कोई सज्जन अरदास करे।

(घ) फिर ताबे बैठा सिंघ ‘हुकम’ ले। जिन्होनें अमृत छका है उन में से यदि किसी का नाम पहले श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी से नहीं रखा हुआ था, उस का नाम अब बदल कर रखा जाये।

(न) अन्त में कड़ाह-प्रसाद बंटे। जहाज़ चढ़े (अमृत पान किये) समूह सिंघ तथा सिंघनियां एक बाटे में से कड़ाह-प्रसाद मिल कर छकें।

३. तनखाह लगाने की विधि

(क) जिस सिक्ख से रहत में कोई भूल हो जाये, तो वह निकट की किसी गुरु-संगत में जा कर उपस्थित हो और संगत के सम्मुख खड़े होकर अपनी भूल को स्वीकार करे।

(ख) गुरु-संगत में से गुरु ग्रन्थ साहिब की हजूरी में पाँच प्यारों का चुनाव किया जाये जो उपस्थित हुए तनखाहिया सज्जन के मामले पर विचार करके तनखाह (दण्ड) का निर्णय करें और संगत को बतायें।

(ग) संगत को क्षमा करते समय हठ नहीं करना चाहिये। न ही तनखाह लगवाने वाले को दण्ड स्वीकार करने में कोई आनाकानी करनी चाहिये। सके, लगानी चाहिये। तनखाह किसी प्रकार की सेवा, विशेषतः जो शारीरिक श्रम द्वारा की जा

(घ) अन्त को इस शुद्धि-कार्य की अरदास की जाये।

४. गुरुमता करने की विधि

(क) गुरुमता केवल उन निर्णयों पर किया जा सकता है, जो सिक्ख धर्म के मूल सिद्धान्तों की पुष्टि के लिये हों, अर्थात् गुरु साहिबान अथवा श्री गुरु ग्रन्थ साहिब की पदवी, बीड़ की शुद्धता, अमृत, रहत-बहत, पन्थ की रचना आदि को बनाए रखने के सम्बन्ध में। अन्य किसी प्रकार के साधारण सकता है। (धार्मिक, विद्या सम्बन्धी, सामाजिक, राजनैतिक) निर्णयों पर केवल मता हो

(ख) यह गुरुमता केवल गुरु-पन्थ का चुना हुआ शिरोमणि संगठन अथवा गुरु-पन्थ का प्रतिनिधि समूह ही कर सकता है।

५. स्थानक निर्णयों पर अपील

स्थानक गुरु-संगतों के निर्णयों पर अपील श्री अकाल तख्त के पास हो सकती है।

Waheguru Ji Ka Khalsa
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